आयोग की योजनायें


  1. अंग्रेजी-हिंदी तथा हिंदी-अंग्रेजी तकनीकी शब्दावलियों / शब्द-कोशों का निर्माण
    छात्रों, विद्वानों, शिक्षकों, अनुसंधानकर्ताओं, वैज्ञानिकों तथा अन्य व्यक्तियों को; जो अपना शैक्षणिक, सांस्थानिक तथा सरकारी काम हिंदी माध्यम से कर रहे हैं, उन्हें मानक तकनीकी शब्दावली की आवश्यकता होती है। हिंदी में ऐसी मानकीकृत शब्दावली न केवल शब्दों को एकरूपता प्रदान करती है, बल्कि विभिन्न राज्यों में शब्दों के प्रयोग में पाई जाने वाली असमानताओं को भीदूर करती है, जिनमें एक ही शब्द के लिए भिन्न-भिन्न पर्यायों का प्रयोग किया जाता है।
  2. अंग्रेजी-क्षेत्रीय भाषा तकनीकी शब्दावलियों/ शब्द-कोशों का निर्माण
    क्षेत्रीय भाषाओं में अध्ययन करने वाले छात्रों और विद्वानों के लिए क्षेत्रीय भाषाओं में मानक तकनीकी शब्दावली की जरूरत होती है। ऐसी शब्दावलियाँ शोधकर्ताओं तथा वैज्ञानिकों के लिए भी अत्यधिक उपयोगी होती है। क्षेत्रीय भाषाओं की मानकीकृत शब्दावली राज्यों की विभिन्न भाषाओं में एकरूपता लाने के लिए विषय-क्षेत्र उपलब्ध कराती है।
  3. त्रिभाषा तकनीकी शब्दावली / शब्द-कोशों का निर्माण
    इन शब्दावलियों में एक अंग्रेजी शब्द के लिए एक हिंदी पर्याय और आधुनिक भारतीय भाषा (भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित) का कोई एक पर्याय दिया जाता है। संबंधित क्षेत्रीय भाषा में हिंदी शब्द का लिप्यंतरण त्रिभाषा-कोश में करने का प्रयास किया जाता है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि देश सभी राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों में राजभाषा का प्रचार-प्रसार जन-साधारण तथा अन्य लक्ष्य समूहों में किया जा रहा है और उस प्रकार यह लोकप्रिय बनती जा रही है।
  4. राष्ट्रीय तकनीकी शब्दावलियों का निर्माण
    आयोग सभी भारतीय भाषाओं में शब्दावलियों का निर्माण एवं अनुमोदन करता है। आयोग का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी भारतीय भाषाओं में शब्दावली की एकरूपता रहे। आयोग का यह भी उद्देश्य है कि विभिन्न विषयों / क्षेत्रों में राष्ट्रीय शब्दावलियों का निर्माण किया जाए जिनमें अंग्रेजी शब्द के लिए भारत के संविधान की आठवीं सूची में उल्लिखित सभी भारतीय भाषाओं में पर्याय दिए जाएँ। ऐसी शब्दावलियों में पाठक सभी भारतीय भाषाओं के विषयवार पर्याय एक ही स्थान पर प्राप्त कर सकता है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत आयोग प्रारंभ में राष्ट्रीय प्रशासनिक शब्दावली की रूपरेखा तैयार कर रहा है।
  5. परिभाषा-कोशों का निर्माण
    वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दों को उनकी परिभाषाओं के परिप्रेक्ष्य में अच्छी तरह से समझा जा सकता है। अतः आयोग सभी विषयों / क्षेत्रों में परिभाषा-कोशों का निर्माण करता है। सामान्यतः शब्दावली में अंग्रेजी तकनीकी शब्द और हिंदी / क्षेत्रीय भाषा के पर्याय दिए गए होते हैं जबकि परिभाषा-कोश में अंग्रेजी तकनीकी शब्द और उनके हिंदी / क्षेत्रीय भाषा के पर्याय दिए जाते हैं तथा उनकी संकल्पनाओं को कुछ ही वाक्यों में स्पष्ट किया जाता है। अतः परिभाषा-कोश छात्रों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं, विद्वानों, वैज्ञानिकों तथा अन्य प्रयोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण और आवश्यक बन गए हैं। इस प्रकार, परिभाषा-कोश शब्दावली निर्माण प्रक्रिया का ही विस्तृत रूप है और इससे शब्दों की बेहतर समझ और उनका प्रयोग सुनिश्चित होता है।
  6. तकनीकी विश्व-कोशों का निर्माण
    इस योजना पर इस समय कार्य रुका हुआ है।
  7. स्कूल-स्तर की शब्दावली का निर्माण
    यदि किसी व्यक्ति को स्कूल स्तर पर ही हिंदी या क्षेत्रीय भाषा के तकनीकी शब्दों का ज्ञान कराया जाता है तो वह उन्हें अच्छी तरह से समझ सकेगा, ग्रहण कर सकेगा और याद रख सकेगा। आयोग, स्कूल स्तर के अनेक विषयवार बृहत् शब्द-संग्रहों तथा परिभाषा-कोशों का निर्माण कर चुका है। एन.सी.ई.आर.टी, एस.सी.ई.आर.टी, एन.आई.ओ.एस (राष्ट्रीय ओपन स्कूल) तथा अन्य ऐसे ही संगठन जो स्कूलों के लिए पुस्तक या पाठ निर्माण का काम करते हैं, इन मानक एवं एकरूप शब्दावलियों का सदुपयोग करेंगे।
    एक जनहित याचिका में भारत के माननीय उच्चतम न्यायालय ने स्कूल स्तर की पुस्तकें तैयार करने वाली एन.सी.ई.आर.टी. तथा अन्य सभी एजेंसियों को यह निर्देश दिया है कि वे अपनी प्रकाशित पुस्तकों में आयोग द्वारा निर्मित शब्दावली के प्रयोग द्वारा तकनीकी शब्दावली में एकरूपता सुनिश्चित करें।
    आयोग ने अब स्कूलों के प्रयोगार्थ विशेष शब्दावलियाँ तथा परिभाषा-कोश प्रकाशित करने का निर्णय लिया है। आयोग ने एन.सी.ई.आर.टी, एस.सी.ई.आर.टी के प्रतिनिधियों तथा विभिन्न राज्यों के शिक्षा निदेशकों के साथ बैठकें तथा विचार-विमर्श हेतु संगोष्ठियां आयोजित की हैं और वर्तमान में उसने विभिन्न चरणों में स्कूल स्तर की शब्दावलियाँ प्रकाशित करने का विशाल कार्य अपने हाथ में लिया है। आयोग यह भी सुनिश्चित करना चाहता है कि पूरे देश में मानक एवं एकरूप शब्दावली का प्रयोग किया जाए।
  8. विभागीय शब्दावलियों का निर्माण और/ या अनुमोदन
    अनेक सरकारी विभागों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, वैज्ञानिक संगठनों, बैंकों तथा अन्य एजेंसियों को अपने कार्यालयों / संस्थाओं के लिए तकनीकी शब्दावलियों की जरूरत होती है। आयोग अपने द्वारा निर्धारित प्रक्रिया तथा मानकों के अनुसार शब्दावली का निर्माण करता है या इन संस्थाओं द्वारा तैयार की गई शब्दावली का अनुमोदन करता है ताकि ये एजेंसियाँ अपने आंतरिक और / या अंतर्विभागीय प्रयोग के लिए अपनी विभागीय शब्दावली प्रकाशित कर सकें। ऐसी एजेंसी अपनी विभागीय शब्दावलियों का प्रकाशन स्वयं या आयोग के साथ संयुक्त रूप से कर सकती है। किसी कार्यालय/ संस्था/ एजेंसी विशेष के अनुरोध पर आयोग उनके प्रयोग के लिए विभागीय शब्दावलियाँ तैयार कर सकता है और उनका कापीराइट व प्रकाशन अधिकार अपने लिए सुरक्षित रखते हुए उनका मूल्य निर्धारित कर सकता है। आयोग विभागीय शब्दावली के प्रकाशन के संबंध में अनुरोध करने वाले कार्यालय/ संस्था/ एजेंसी के साथ करार या समझौता कर सकता है या पत्राचार द्वारा शर्तें और निबंधन तय किए जा सकते हैं।
  9. शब्दावलियों का परिशोधन एवं अद्यतनीकरण
    आयोग समय-समय पर शब्दावलियों और परिभाषा-कोशों की समीक्षा करता है। वैज्ञानिक नवाचारों, प्रौद्योगिकीय क्रांतियों, वैश्वीकरण, उदारीकरण तथा अन्य सामाजिक-आर्थिक विकासों के कारण जो नई अभिव्यक्तियाँ प्रचलन में आ गई हैं उनसे संबंधित नए उपयुक्त शब्दों को वर्तमान शब्दावलियों में जोड़ दिया जाता है ताकि उनका अद्यतनीकरण किया जा सके। पहले से निर्मित/ परिभाषित शब्दों को भी उचित प्रयोग और आवश्यक संशोधन और सुधार की दृष्टि से अद्यतन किया जाता है। उन शब्दों को हटा दिया जाता है जो अब प्रयोग में नहीं है।
  10. अखिल भारतीय शब्दावली की पहचान और प्रकाशन
    सभी शिक्षाविदों, भाषा-विज्ञानियों एवं विद्वानों की यह धारणा है कि भारतीय भाषाओं की तकनीकी शब्दावली ऐसी होनी चाहिए जिसमें सभी भाषाओं में परस्पर समरूपता हो ताकि उच्च शिक्षा अनुसंधान तथा सभी क्षेत्रों में वैज्ञानिक ज्ञान के आदान-प्रदान एवं अंतर-भाषायी संप्रेषण में सुविधा रहे। इस प्रयोजन के लिए भारतीय भाषाओं में एक सर्वनिष्ठ एवं समरूप शब्द भंडार होना आवश्यक है। चूंकि देश के विभिन्न राज्यों की भाषाओं में तकनीकी शब्दों के मूलरूप प्रायः एक समान हैं अतः अनेक शब्दों में आपस में समानता दृष्टिगत होती है। आयोग ऐसे शब्दों की पहचान कर अखिल भारतीय शब्दावलियां प्रकाशित करता है। प्रयोक्ताओं को इन शब्दावालियों का निःशुल्क वितरण किया जाता है।
  11. निर्मित एवं परिभाषित शब्दों का प्रचार-प्रसार और उनकी विवेचनात्मक समीक्षा
    तकनीकी शब्दावली का तब तक कोई महत्व नहीं है जब तक उसका व्यापक प्रयोग न किया जाए। शब्दावली के प्रयोग में स्पष्टता और एकरूपता लाने के लिए उसका मानकीकरण ही नहीं बल्कि उसको लोकप्रिय बनाना भी परम आवश्यक है। यह तभी संभव होगा जब समाज के विभिन्न लक्ष्य-समूहों, प्रयोक्ता-समूहों, शिक्षकों, विद्वानों, प्रशिक्षणार्थियों तथा छात्रों आदि के साथ मिलकर निर्मित / परिभाषित शब्दों का प्रचार-प्रसार योजनाबद्ध ढंग से किया जाए, उन पर सक्रिय विचार-विमर्श किया जाए और परस्पर-संवाद सत्रों का आयोजन किया जाए।
    चूंकि विभिन्न स्तरों पर शिक्षकों को हिंदी/क्षेत्रीय भाषा की शब्दावली का पर्याप्त ज्ञान नहीं होता है अतः उन्हें निर्मित / परिभाषित पर्यायों से परिचित कराए जाने की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त, विभिन्न संस्थाओं के अधिकारियों और लिपिकवर्गीय कर्मचारियों तथा वैज्ञानिकों को तकनीकी शब्दों के प्रयोग मे समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अतः उन्हें हिंदी तथा अन्य आधुनिक भारतीय (क्षेत्रीय) भाषाओं में उचित रूप से अभिविन्यस्त/प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है। लक्ष्य-समूहों या प्रयोक्ता-समूहों की अनेक समस्याओं को ध्यान में रखते हुए शब्दावली के प्रचार-प्रसार तथा उसकी विवेचनात्मक समीक्षा के लिए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
  12. हिंदी तथा अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में विश्वविद्यालय स्तर की पुस्तक-निर्माण योजना
    वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग विभिन्न राज्यों की हिंदी ग्रंथ अकादमियों तथा विश्वविद्यालय प्रकोष्ठों के माध्यम से विभिन्न विषयों पर अप्रत्यक्ष रूप से विश्वविद्यालय स्तर की पुस्तकों का प्रकाशन करता है। वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, विश्वविद्यालय स्तर की पुस्तकों के प्रकाशन के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने के अतिरिक्त किए गए कार्य का अनुवीक्षण और समन्वय करता है। विश्वविद्यालय स्तर की पुस्तक-निर्माण योजना का क्रियान्वयन हिंदी तथा अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में पुस्तक निर्माण के लिए वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग की सहायता अनुदान योजना तथा मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार की संशोधित योजना 1979 के दिशा-निर्देशों के अनुसार किया जाता है। ये पुस्तकें उच्च शैक्षिक स्तर की होनी चाहिए, साथ ही इनमें हिंदी/क्षेत्रीय भाषाओं की मानक शब्दावली का समावेश होना चाहिए। इस योजना के तहत राज्य की ग्रंथ अकादमियों और विश्वविद्यालय प्रकोष्ठों को अनुदान जारी किया जाता है।
    वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग अपनी ओर से क्षेत्रीय भाषाओं में पुस्तकें प्रकाशित नहीं करता है। बहरहाल, क्षेत्रीय भाषाओं के माध्यम परिवर्तन की सुविधा के लिए वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग संबंधित क्षेत्रीय भाषाओं में पुस्तकें प्रकाशित करने के लिए विभिन्न राज्यों के पाठ्य-पुस्तक बोर्डों तथा विश्वविद्यालय प्रकोष्ठों को सीधे या संबंधित राज्य सरकार के माध्यम से अनुदान उपलब्ध कराता है, और इन गतिविधियों का अनुवीक्षण करता है।
  13. पाठ-संग्रहों (मोनोग्राफ) का निर्माण एवं प्रकाशन
    इस योजना पर इस समय कार्य रुका हुआ है।
  14. चयनिकाओं का निर्माण एवं प्रकाशन
    इस योजना पर इस समय कार्य रुका हुआ है।
  15. पत्रिकाओं का निर्माण एवं प्रकाशन
    आयोग मूल लेखन को प्रोत्साहित करने के लिए हिंदी में दो त्रैमासिक पत्रिकाएँ निकालता है और इस प्रकार छात्रों, विद्वानों, शिक्षकों, वैज्ञानिकों, पत्रकारों आदि की जरूरतों को पूरा करता है। एक त्रैमासिक पत्रिका का नाम ‘ज्ञान गरिमा सिंधु’ है जो सामाजिक विज्ञान और मानविकी विषयों से संबंधित है और दूसरी त्रैमासिक पत्रिका का नाम ‘विज्ञान गरिमा सिंधु’ है जो विज्ञान और प्रौद्योगिकी विषयों / क्षेत्रों पर निकाली जाती है।
    ज्ञान गरिमा सिंधु
    ‘ज्ञान गरिमा सिंधु’ एक त्रैमासिक पत्रिका है जिसमें मानविकी तथा सामाजिक विज्ञान विषयों से संबंधित लेख प्रकाशित होते हैं। इस पत्रिका का उद्देश्य हिंदी में अध्ययन करने वाले छात्रों के लिए मानविकी और सामाजिक विज्ञान विषयों से संबद्ध उपयोगी एवं नवीनतम मूल पाठ प्रदान करना तथा पूरक साहित्य को लोकप्रिय बनाना है। यह पत्रिका मिले-जुले प्रकार की है, जिसमें मानविकी तथा सामाजिक विज्ञान से संबंधित तकनीकी लेख, शोध लेख, निबंध, मॉडल शब्दावलियाँ, परिभाषा-कोश, कविताएँ, व्यंग्य चित्र, सूचनाएँ, समाचार तथा पुस्तक समीक्षा आदि प्रकाशित की जाती है। विज्ञान गरिमा सिंधु
    ‘विज्ञान गरिमा सिंधु’ भी एक त्रैमासिक पत्रिका है, जिसमें आधार-विज्ञानों, अनुप्रयुक्त विज्ञानों तथा प्रौद्योगिकी से संबंधित लेख प्रकाशित किए जाते हैं। इस पत्रिका का उद्देश्य हिंदी में अध्ययन करने वाले छात्रों के लिए विज्ञान विषयों से संबंधित उपयोगी तथा नवीनतम मूल पाठ प्रधान तथा पूरक साहित्य को लोकप्रिय बनाना है। यह पत्रिका मिले-जुले प्रकार की है जिसमें वैज्ञानिक लेख, शोध लेख, तकनीकी निबंध, मॉडल शब्दावलियां तथा परिभाषा-कोश, विज्ञान से संबंधित कविताएँ और कहानियाँ, व्यंग्यचित्र व वैज्ञानिक जानकारी, विज्ञान-समाचार, पुस्तक समीक्षाएँ आदि प्रकाशित की जाती हैं।
  16. शब्दावली क्लबों की स्थापना एवं अनुरक्षण
    वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग विभिन्न राज्यों में शब्दावली क्लब स्थापित करता है ताकि प्रयोक्ताओं को वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग और उनकी एजेंसियों का संपूर्ण शब्दावली साहित्य एक ही स्थान पर उपलब्ध कराया जा सके। वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग में एक राष्ट्रीय शब्दावली पुस्तकालय स्थापित करने की भी योजना है। ‘उड़ीसा राज्य पाठ्यपुस्तक निर्माण ब्यूरो’, भुवनेश्वर, ‘लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ, विज्ञान परिषद प्रयाग’, इलाहाबाद तथा ‘प्रकाशन प्रभाग, मैसूर विश्वविद्यालय’, मैसूर आदि में पहले से ही शब्दावली क्लब स्थापित कर दिए गए हैं। आयोग देश के सभी राज्यों में शब्दावली क्लब स्थापित करना चाहता है और वह उनका उचित अनुरक्षण करने का इच्छुक है।
  17. प्रकाशनों की बिक्री
    आयोग के प्रकाशनों की बिक्री के लिए प्रकाशन विभाग, सिविल लाइन्स, दिल्ली में नियमित बिक्री केंद्र के अतिरिक्त आयोग में अपना नियमित बिक्री केंद्र भी है। इनके अतिरिक्त, प्रदर्शनियों/ बैठकों/ कार्यशालाओं के दौरान भी बिक्री केंद्र आयोजित किए जाते हैं। भारत सरकार के प्रकाशन विभाग के निम्नलिखित बिक्री केंद्रों से भी, आयोग के प्रकाशन खरीद कर प्राप्त किए जा सकते हैं।
    1. किताब महल
    प्रकाशन विभाग
    भारत सरकार, बाबा खड़ग सिंह मार्ग,
    स्टेट एम्पोरियम बिल्डिंग,
    यूनिट नं. 21, नई दिल्ली

    2. पुस्तक डिपो
    प्रकाशन विभाग
    के.एस. रॉय मार्ग,
    कोलकाता-700001

    3. सेल काउंटर
    प्रकाशन विभाग
    भारत सरकार, सी.जी.ओ. काम्प्लेक्स
    न्यू मेरीन लाइन्स, मुंबई-400020

    4. सेल काउंटर
    प्रकाशन विभाग
    भारत सरकार, उद्योग भवन,
    गेट नं. 3, नई दिल्ली-110001

    5. सेल काउंटर
    प्रकाशन विभाग
    भारत सरकार, (लॉयर्स चैंबर),
    दिल्ली उच्च न्यायालय,
    नई दिल्ली-110003
    गेट नं. 3, नई दिल्ली-110001

    6. सेल काउंटर
    प्रकाशन विभाग
    भारत सरकार, संघ लोक सेवा आयोग,
    धौलपुर हाउस,
    नई दिल्ली-110001
  18. प्रकाशनों का निःशुल्क वितरण
    आयोग प्रयोक्ताओं को शब्दावली से संबंधित कुछ पुस्तकों का निःशुल्क वितरण भी करता है। विभिन्न तकनीकी विषयों में ‘मूलभूत शब्दावलियाँ’ शीर्षक के अंतर्गत शिक्षकों, छात्रों, वैज्ञानिकों, अधिकारियों, लिपिकवर्गीय कर्मचारियों आदि को संक्षिप्त शब्दावलियां निःशुल्क उपलब्ध कराके उन्हें हिंदी में मानक तकनीकी शब्दों का प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित करता है।
  19. प्रदर्शनियाँ आयोजित करना
    आयोग द्वारा आयोजित की गई पुस्तक प्रदर्शनियों का उद्देश्य आयोग के प्रकाशनों का प्रदर्शन करना है ताकि अधिक से अधिक लोग आयोग और हिंदी ग्रंथ अकादमियों, पाठ्य-पुस्तक बोर्डों तथा विश्वविद्यालय प्रकोष्ठों जैसी एजेंसियों की कृतियों की जानकारी प्राप्त कर सकें। प्रदर्शनियों के दौरान भी आयोग द्वारा प्रकाशित पुस्तकों की बिक्री की जाती है।
    आयोग के परिसर में कार्यालय समय के दौरान आम जनता के लिए एक स्थायी प्रदर्शनी केंद्र उपलब्ध है। आयोग के प्रदर्शनी केंद्र से संलग्न एक बिक्री केंद्र भी है, जहां छूट पर आयोग के प्रकाशनों की खरीद की जा सकती है।
    राज्य, राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेलों में आयोग द्वारा अस्थायी प्रदर्शनी केंद्र खोले जा सकते हैं। इन मेलों को आयोजित करने वाली एजेंसियाँ, आयोग को आवश्यक सूचना या प्रस्ताव भेज सकती हैं, ताकि आयोग उन पर विचार कर सके।
    आयोग द्वारा आयोजित किए गए विभिन्न कार्यक्रम-स्थलों तथा विभिन्न अन्य एजेंसियों द्वारा संचालित किए गए अकादमिक कार्यक्रमों के स्थलों पर भी अस्थायी प्रदर्शनी केंद्र खोले जा सकते हैं।
  20. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की उप-योजना के अंतर्गत भारतीय भाषाओं में विश्वविद्यालय स्तरीय पुस्तक निर्माण तथा वितरण संबंधी योजना भारत सरकार ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में विश्वविद्यालय स्तरीय पुस्तक निर्माण योजना का आरंभ किया है। इस कार्य के लिए अलग से आवश्यक बजट की व्यवस्था की गई है। वै.त.श. आयोग को निर्दिष्ट संस्वीकृति बजट के संपूर्ण उपयोग करने हेतु उपयुक्त दिशा-निर्देश एवं कार्य प्रणाली का विवेचन निम्नलिखित हैः-

    (i) इस योजना के अंतर्गत अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति हेतु डिप्लोमा/स्नातक उपाधि/ स्नातकोत्तर उपाधि/ स्तर के लिए विज्ञान/तकनीकी विषयों पर इन्हीं वर्गों के विशेषज्ञों/लेखकों/शिक्षकों द्वारा पाठ्यक्रम के अनुसार पाठ्य-पुस्तकें तैयार की जाएँगी।
    (ii) इस योजना के अंतर्गत अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के छात्रों को 50 प्रतिशत की छूट के साथ प्रकाशित पुस्तकें बाँटी जाती हैं। प्रकाशित पुस्तकों में इस तथ्य का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए।
    (iii) प्रस्तावित अध्ययन सामग्री के अलावा माध्यम परिवर्तन में सहायक संदर्भ पुस्तकें, मोनोग्राफ, जर्नल इत्यादि सामग्री वांछित प्रक्रिया के अंतर्गत निर्मित की जा सकती हैं।
    (iv) वस्तुतः इस योजना में मौलिक वैज्ञानिक लेखन को प्राथमिकता दी गई है परंतु आवश्यकतानुसार अनुवाद/रूपांतरण को भी अपनाया जा सकता है।
    (v) पुस्तक निर्माण कार्यक्रम के लिए आयोग द्वारा वर्तमान दिशा-निर्देश के अनुसार पांडुलिपि/मैनुस्क्रिप्ट तैयार करवायी जाएगी।
    (vi) आयोग यह अपेक्षा रखता है कि विभिन्न ग्रंथ अकादमियों, पाठ्य-पुस्तक बोर्डों, पुस्तक निर्माण प्रकोष्ठों अथवा संबद्ध संगठनों की सहायता से हिंदी तथा क्षेत्रीय भाषाओं में माध्यम परिवर्तन के कार्यक्रम को लागू किया जा सके। लेखक, पुनरीक्षक, अनुवादक एवं स्कॉलर्स; जो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति से संबंधित हों, वे इस योजना से जुड़ने के लिए आयोग अध्यक्ष/संबंधित संस्था के प्रमुख से उपर्युक्त संदर्भ में संपर्क कर सकते हैं।



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